शनिवार, 16 मार्च 2013

शिक्षा , एन जी ओ और व्यक्तिगत स्वार्थ : संदीप नाईक





1   मुझे तो लगता है शिक्षा से सारे कारपोरेट और एनजीओ हट जाये तो शिक्षा का बड़ा एहसान होगा जितना कबाडा इन नौसिखियों ने नवाचार के नाम पर किया है गत साठ बरसों में और शिक्षा और शिक्षकों के नाम पर गढ़ और मठ बनाकर ससुरे बैठे है. इससे तो बेहतर है कि शिक्षा को शिक्षा के नाम पर छोड़ दो और इन सबको बाहर करो अपनी रोजी रोटी और जिंदगी चलाने के नाम पर प्रयोग और कुत्सित कामनाओं के नाम पर पुरे परिदृश्य का कबाडा कर रखा है. मै बहुत जिम्मेदारी और गंभीरता से यह कह रहा हूँ और फ़िर टुच्चे टुच्चे प्रयोग छोटे स्तर पर करने से कोई हालात नहीं सुधर सकते. जो लोग शिक्षा का क, ख, ग , घ नहीं पढ़े वो शिक्षा के रसूखदार बने बैठे है और लाखों कमा रहे है और हालात यह हो गये है कि इनके घटिया प्रयोगों और नवाचारों से हिन्दुस्तान की पीढियां बर्बाद हो गई है और आज देश ने भ्रष्ट, दुराचारी और दानव ही पैदा किये है और इस सबके लिए ये ही जिम्मेदार है. मै एक सच्ची और क्रूर वास्तविकता कह रहा हूँ. जाकर देखिये ग्रामीण क्षेत्रों में किस तरह से अनपढ़ गंवार और मूर्ख किस्म के एनजीओ कार्यकर्ता स्कूलों में प्रयोग कर रहे है किस तरह के लोग वहाँ शिक्षा की बहस कर रहे है, और किस तरह के कार्पोरेटी लोग अपनी रोटी गरीबी से कमा रहे है. ये वो शातिर लोग है जो सब कुछ कर सकते है क्योकि इनके बाप दादे प्रशासन, उद्योगपति घरानों और राजनीती से आते है. शिक्षक से पूछिए कि क्या वो यह सब चाहता है या उसे थोप दिया गया है यह सब.......? जैसे जनगणना, आर्थिक गणना, पशु गणना, चुनाव, नसबंदी और ना जाने क्या क्या......जब तक शिक्षा से ये तथाकथित प्रयोगधर्मी और नवाचारी (बुद्धिजीविता का व्याभिचारी) नहीं हटेगा तब तक शिक्षा का कोई सुधार नहीं कर सकता. करोड़ों रूपये लगाकर शिक्षा में जो औधोगिक घराने स्कूल की सीमा में घूस रहे है उनपर लगाम कसी जानी चाहिए. मप्र में पिछले तीस बरसों में कई संस्थाओं ने शिक्षा की जो दुर्गति की है उसका हिसाब लिया जाना चाहिए. इसमे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल रहे है और तमाम शिक्षाविद भी जो अपने विभाग के लिए सिर्फ कूड़ा-कचरा थे. अब ये ही कारिंदे देश भर में और तमाम वृद्धाश्रमों में शिक्षा की दुर्गत कर रहे है और लालच सिर्फ और सिर्फ रूपया है अपनी संस्था का कॉर्पस जुटाना है बढ़ाना है बस.

2  मेरे कमेंट्स पर Rajesh Utsahi के लिए मेरी तल्ख़ प्रतिक्रिया..............राजेश भाई बिलकुल सहमत हूँ पर मेरे विकसित होने में एकलव्य का कोई योगदान नहीं है मै जहां भी होता इसी तरह का काम करता यह बात बहुत कचोटता है कि एकलव्य ने मेरा जीवन सुधार दिया एक बार सुनील गुप्ता को एकलव्य के किसी सज्जन ने कह दिया था वह जवाब ऐसा करारा था कि बस.खैर मै उस बहस में नहीं पडना चाहता, सिर्फ यह कि अगर मै, बंधू, दिनेश पटेल या दिनेश शर्मा, प्रकाश कान्त या यतीश भाए जैसे लोग अपना जीवन नहीं खपाते तो सारे सुधार हवा में रह जाते !!! देखा नहीं था बाबरी मस्जिद के बाद क्या दुर्गति हुई थी बड़े आकाओं की. और जहां तक अजीम प्रेमजी की बात है मै चाहता था क्योकि मुझे लगा था कि वहाँ शिक्षा का काम हो रहा है और आर्थिक रूप से वो बेहतर पैकेज दे रहे थे, जिसके लिये आप भी भोपाल छोड़कर बेंगलोर गये थे, इसमे गलत क्या है? परन्तु जब मुझे यह लिखित में कहा गया कि शिक्षा में मेरा अनुभव नहीं है बावजूद इसके कि दस साल मैंने CBSE Schools, Army School में और दीगर स्कूलों में पढ़ाया और प्राचार्य का काम किया है, दस साल एकलव्य में काम किया है तो मुझे अजीम प्रेमजी में बैठे मूर्ख शिरोमणि और रिज्युम चयन करने वालों की कमअक्ली पर तरस आया, भोपाल में जिस तरह के लोगों की भर्ती हुई है वह दिखाता है कि क्या शिक्षा की समझ वाले लोग वहाँ बैठे है, यह मेरा नहीं कई वरिष्ठ लोगों का मूल्यांकन है कि शिक्षा के अलावा काम करने वाले यहाँ विशेषग्य है....हा हा हा, खैर मै किसी की योग्यता पर सवाल न्ही उठा रहा बल्कि आपने याद दिलाया मुझे तो, मै भी "कह ही दूँ के" भाव से कह रहा हूँ. मैंने तय किया कि ऐसे मठ या वृद्धाआश्र्रम में नहीं जाउंगा जो सिवाय कार्पोरेटी चापलूसी के अलावा कुछ नही कर पायेंगे. और अब सवाल निंदा का तो जो काम कर रहे है उनका सम्मान अपनी जगह है और काम की शैली अपनी जगह. मै पुनः कहना चाहता हूँ कि मै बहुत गंभीरता से लिखता हूँ और जो आप कह रहे है कि "आप यहां जो बात कहते हैं उसे लोग गंभीर मानकर उस पर अपनी प्रतिक्रियाएं भी देते हैं। इनमें अधिकांश युवा हैं।" ये युवा कई गुना समझदार है मेरे और हम-आप से, जब हम युवा थे. ये पीढ़ी अपना शोषण नहीं करवाती, ना ही इमोशनल ब्लेकमेल का शिकार है, ना ही छोटे कस्बों से आई है. एक बात तो आप मानेंगे ही कि हम सब एकलव्य में शोषित- दमित थे तभी तो आप भी सत्ताईस बरसों बाद अजीम प्रेमजी में चले गये चाहे कारण जो भी हो आर्थिक, स्वतन्त्रता, या नया करने की ललक...और मै इसलिए बाहर आया कि टाटा का रूपया खाकर / लेकर मै देवास में मई दिवस नहीं मना सकता था और ना ही नुक्कड़ नाटक कर सकता था, पर...... .खैर ! और जहां तक निराशा की बात है वो मुझमे नहीं है मै अभी भी फील्ड में सक्रीय हूँ और कई आन्दोलनों से जुडा हूँ, चीजों को आर-पार देखना निराशा नहीं एक समझदारी है और हर पहलू को पैतालीस की उम्र में जोश से देखने के बजाय समालोचनात्मक तरीके से देखना एक महती जिम्मेदारी और समझदारी हुआ करती है क्योकि इन्ही युवाओं के सामने सच्चाई रखना हमारा काम भी है....शायद आप इससे सहमत हो...राजेश भाई. सकारात्मकता जोश में ही अच्छी होती है मप्र के शिक्षा परिदृश्य से और राजनीती से आप परिचित ही है और एकलव्य का ही उदाहरण ले तो बता दे कि होविशिका का क्या हुआ, या आज एकलव्य का नेतृत्व किसके हाथों में है - यह वही दिल्ली का गेंग है जो उस समय भी हावी था और आज भी हावी है. राजेश और संदीप तब भी उपेक्षित थे और आज भी उपेक्षित ही होते यदि वहाँ सड रहे होते तो जैसे कि हमारे कई साथी है आज भी वहाँ, और एकलव्य का शिक्षा से आज क्या जुड़ाव है सिवाय किताब छापने और बेचने से ज्यादा, या दूसरे राज्यों में कंसलटेंसी आधार पर किताबे ठेके पर तैयार करवाने के अलावा...एनजीओ को हर जगह से हटाना चाहिए या नहीं यह बड़ा मुदा है पर एनजीओ ने जो गन्दगी फैलाई है उसे साफ़ करने में सदियाँ लग जायेंगी यह निश्चित है और यह मै पुनः पुरे "होशो-हवास" में कह रहा हूँ. इसे मेरा फ्रस्ट्रेशन नहीं समय की मांग पर एक सही आकलन और जिम्मेदाराना बयान के रूप में दर्ज किया जाये. मै यह सब इतना व्यक्तिगत नहीं लिखना चाह रहा था परन्तु "आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया" वाला गाना है रफ़ी साहब का ....

गुरुवार, 7 मार्च 2013

धर्म , कानून और स्त्री अधीनता



वह उसे प्रतिदिन नहीं तो मौके – बेमौके जरूर पीटता है , क्या पहनना है और घर से बाहर कदम नहीं रखना है से लेकर किस रिश्तेदार के यहाँ जाना है किसके यहाँ नहीं यह भी वही तय करता है । फिर भी सीता मौसी को देखा जाये तो सप्ताह के एक दो दिनों को छोडकर हर दिन के स्वामी को जन्म-जन्मांतर तक उसी व्यक्ति को पति बनाने के लिए व्रत रखकर खुश करती रहती है । यदि सचमुच व्रत करने का फल मिल जाए तो यह बात कल्पनातीत नहीं है कि उसे जन्म-जन्मांतर तक कितना कष्ट भोगना है । उसकी पिटाई , उसकी अस्तित्वहीनता और उसे मिलने वाले दुत्कार निरंतर चलते ही रहेंगे उसके खत्म होने की स्थिति बस उतनी ही अवधि की होगी जबतक कि अगले जन्म में उसकी शादी फिर उसी व्यक्ति से नहीं हो जाती । इतना सब होने के बावजूद वह व्रत आदि करके उसी पति को मांग रही है । हम तमाम आर्थिक आत्मनिर्भरता की कमी को इसका कारण बता दें पर यह समुचित कारण बनकर उभर नहीं पाता । पति की लंबी उम्र के लिए करवाचौथ आदि तमाम तरह के व्रत वे भी पूरे होशो-हवश में करती हैं जो विश्वविद्यालयों में वरिष्ठ प्राध्यापकों तक पहुँच गयी हैं । इस तरह से सीता मौसी अकेली स्त्री नहीं है उनके ही ससुराल में बहुत सी अन्य स्त्रीयां हैं जो अपने पतियों से पिटती हैं । इस तरह से उसे या उस जैसी अन्य स्त्रियों को अपनी दशा अनोखी नहीं लगती । फिर कोई वजह ही नहीं बंता कि , पति को इसका कारण माना जाए । पति तो बस माध्यम है उनका तो भागे ( भाग्य ही ) खराब है
              दिल्ली में हमारी गली में रात के 11 बजे के बाद प्रतिदिन चीख पुकार होती थी (आज भी होती होगी) फिर गली में भाग-दौड़ होती कोई भाग रहा होता और कुछ कदम उसके पीछे दौड़ रहे होते । एक दिन गेट खोलकर देखा तो एक सिपाही जो शायद तभी तभी ड्यूटी से वापस आया था वह बानियान और खाकी पेंट में एक कमजोर सी दिखने वाली औरत को पीट रहा था , उसका बच्चा उसके पैरों से चिपका जा रहा था । जल्द ही हमारी मकान मालकिन ने गेट बंद केआर वापस आने का आदेश दे दिया । बाद में उनहोने ही बताया कि वह व्यक्ति दिल्ली पुलिस में सिपाही है इसलिए कोई उससे नहीं उलझता । मैंने भी कुछ नहीं किया अलबत्ता दिल्ली महिला आयोग को लिखा जरूर और हम सब गली वालों की तरह उसने भी कुछ नहीं किया । एक दिन उस स्त्री को भी गली भर की सुहागिनों के साथ बैठकर सुहाग के लिए कोई पूजा करते हुए देखा वो भी भारी मेक-अप के साथ ।
            यह बहुत ही रोचक सी दशा हुई कि जिसके हाथों रोज़मर्रा की मौत मिले उसकी ही लंबी आयु और उसे ही बार बार पाने की प्रार्थना की जाए । इसके पीछे समाज में नए सदस्यों के होने वाले प्रशिक्षण कुछ मदद करते प्रतीत होते हैं । लड़कियों को बचपन से ही इस तरह से सिखाया जाता है कि आगे चलकर सबकुछ बड़े स्वाभाविक ढंग से झेलने लगती है । उनकी तैयारी ही इस तरह कारवाई जाती है कि वह अन्तः एक दोयम दर्जे के नागरिक के हैसियत तक पहुँच जाती है । इस संबंध में लीला दुबे का लेख पितृवंशीय भारत में हिन्दू लड़कियों का सामाजीकरण देश भर में इस तरह के प्रशिक्षणों की सूचना देता है जो स्त्री को स्त्री बनाए रखने में आगे मदद करते हैं ।
प्राचीन भारतीय लेखन और धार्मिक साहित्य मिलकर स्त्री की असपष्ट और भ्रामक तस्वीर बना देते हैं फिर स्त्री को जीवन पर्यंत इसी उलझे स्वरूप में रखकर उसके साथ व्यवहार किए जाते हैं । एक तरफ तो यह कहा जाता है कि शास्त्रों में उसे देवी कहा गया है । वो देवी प्रसन्न होने पर किसी की भी इच्छा पूरी कर सकती है और यदि क्रोधित हो गयी तो भयानक विनाश ल सकती है जो केवल एक के विनाश तक सीमित नहीं है बल्कि समूहिक विनाश भी कर सकती है । तात्पर्य यह कि वह बहुत शक्तिशाली है । परंतु अगले ही लेखन में यह छवि बनाई जाती है कि उसका मन स्थिर नही रहता , वह मुक्ति या निर्वाण के रास्ते से भटकाने का कार्य करती है । अपरिपक्वता और लालच आदि उसमें कूट कूट कर भरे होते हैं । मेरे घर में स्त्रियों पर होने वाली बातचीत के समय मेरे पिता सहज ही शास्त्रीय मुद्रा धरण कर लेते हैं और शास्त्र से एक श्लोक कह उठते हैं
              त्रिया चरित्रम पुरुशस्य भाग्यम
              देवो न जानती कुतो मनुष्यम     ।
और यदि किसी स्त्री से खुश हो गए तो –
               खन देवी नागिन
               खन अनुरागिन
               खन खन कन्याकुमारी   ।
इन दोनों तरह की छवियों को स्पष्ट ही स्त्रियों ने स्वयं नहीं गढ़ा अर्थात स्वयं अपने लिए नहीं लिखा । ऐसे समाज में जहां उन पर तमाम प्रतिबंध हों वहाँ उनकी शिक्षा दीक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती तो उनके लेखन को स्वीकार कर लेने की बात तो बहुत दूर है । यह सब उसके ऊपर एक तरह की श्रेष्ठता के अहंकार में लिखा गया है और लंबे समय तक दूरियाँ तय करते हुए सामाजीकरण दर सामाजीकरण यह आज के स्वरूप तक पहुंचा है ।
   लंबे समय से चूंकि कथित तौर पर स्त्री को हीं लिंग का माना जाता रहा है अतः उसे बहुत से अधिकारों और विशेषाधिकारों से वंचित रखने की परंपरा रही जिन अधिकारों और विशेषाधिकारों को पुरुषों का माना गया । इसी ने उन्हें पुरुषों के अधीन रखने की सैद्धांतिकी का निर्माण किया जहां कोई भी पुरुष योग्य से योग्य पत्नी के अस्तित्व को अपने से नीचे ही मानता है ।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह अधीनता मुख्य रूप से बहुसंख्यक हिंदुओं में है लेकिन यह यहाँ के इस्लाम और इसाइयों में भी देखे जा सकते हैं । एक तरह से स्त्री अधीनता की यह स्थिति भारत भर का सच है जिसमें धर्म का बहुत बड़ा योगदान है । भारतीय संविधान यह घोषित तो कर देता है कि कानून के सामने स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं पर वह अपनी ही एक व्यवस्था से पुनः बांध जाता है और समानता संबंधी जो बात स्त्रियों के जीवन में आमूल परिवर्तन ला सकती थी वह प्रभावहीन होकर रह जाती है । संविधान में व्यक्ति को अपना धर्म मानने और उसके अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता है यही स्वतन्त्रता स्त्रियों के लिए घातक हो जाती है क्योंकि भारत में परिवार और वैयक्तिक कानून में धर्म का ही बोलबाला है । यहाँ धर्म स्त्रियों को यह अधिकार नहीं देता कि वह विवाह के बाद कहाँ पर रहेगी यह तय है कि वह पिता का घर छोडकर पति के घर आएगी इस लिए उसे बचपन से तैयार किया जाता है । फिर माइका उसे उसके भावी जीवन के लिए तैयार करता है । धर्म की व्याख्या समय समय पर बदलती रहती है जो अपने आप में आए कट्टर पंथी तत्वों के हिसाब से स्त्रियों पर तमाम तरह की पाबन्दियाँ लगाने का कार्य करती है ।
सीता मौसी का ससुराल या कि भारत का कोई अन्य स्थान धर्म के चंगुल से मुक्त नहीं है अतः उन पर धर्म के अधीन आचरण करने का दबाव लगातार बना ही रहेगा । और कुछेक स्त्रियों के मुक्त होने को हम बहुत बड़ी उपलबद्धि मान कर बैठ जाएँ तो यह हमारी खुशी है ।